कलियुग का माया।
Submitted By: PRAJWAL C G
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अरे ओ भइया, ज़रा सुनो, कलियुग का माया। बड़ी अजीब है ये दुनिया, कौन है अपना, कौन पराया। खाना हो या पीना हो, जीना हो या मरना हो , हर चीज़ के लिए यहाँ चाहिए रुपय्या, यही कलियुग का माया। मेहनत की कमाई, पेट भी न भर पाए, उधारी का बोझ कंधों पर बढ़ते ही जाए। चैन की नींद किसी को मिल ना पाए, इधर ही स्वर्ग, इधर ही नरक, "कर्मा" नहीं देखता किसी में फ़र्क। बड़ी अजीब है ये दुनिया, यही कलियुग का माया।
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Reg ID: BF25-5837
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