Submission 3614

इंतज़ार या इत्तेफाक

Submitted By: Swasti Guruling Gani

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बेवक़्त ही सही मगर तुमसे मिलके बहुत खुश हूँ हा शायद हमारी कश्ती का सफर बस यहीं तक था तसल्ली तो मगर सिर्फ इस बात से है की कुछ वक्त के लिए ही सही मैं तेरी थी और तू मेरा था.. कुछ लम्हे काफी हसीन थे ना अधूरे तुम ना अधूरी मैं मगर दिल आज भी ये सोच के बेताब हो जाता है कि तुमने मुझे कभी अपना कहा था.. दिल आज भी झूम उठा जब वो लम्हे याद आते थे जब हमारे बीच सब सच्चा था.. क्या हो तुम हमारे? ये सवाल ना जाने कितनो ने किया ह मुझसे मगर इस सवाल का कभी किसी को सही उतार दे ही नहीं पाई.. शायद जब तक मैं उन्हें उतार देने में समर्थ थी तब तक किनारा करीब था.. मंजिल सामने थी मगर तुमसे बस पूछ नहीं पाई.. नहीं पूछ पाई कि इस अधूरे रिश्ते को मैं क्या नाम दूं.. हा मगर उन्हें ये जरूर कह सक्ती हूँ कि कुछ वक्त के लिए ही सही मगर मैं सिर्फ तेरी थी और तू सिर्फ मेरा था...

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Reg ID: BF25-5791

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