है क्षीण हुआ अस्तित्व मेरा
Submitted By: prachi naruka
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महल हृदय की भावनाओं का, संजोकर हर दृश्य किया खड़ा. मुझ बैरी, अभागिन को, प्रीत करना अत्यंत अकल्पनीय पड़ा, जब स्वाभिमान कुम्हला गया, और आत्मसम्मान सकुचा गया, नाम में भूलने लगी, आभास हुआ है क्षीण हुआ अस्तित्व मेरा...... मैं रोती जिन जिन रातों में, तूने उसे भी नाट्य कहा, कह प्रीत मेरी थी कोई खेल मदारी, या थी तेरे लिए बस में कोई दुराचारी? क्यू तूने मुझे यूँ पीड़ दिया, क्यूँ आजीवन मुझे अधीर किया? है टूट गया वो महल खड़ा, है क्षीण हुआ अस्तित्व मेरा.... मैं भागती, दौड़ती, सर्द में, कांपती वैशाख की रातों में, मै खिलखिलाती हँसी छोड़, ताकती चांद को बरसातों में, मैंने तो तुझको सौपा था हृदय अपना, फिर कैसे तूने इसे हीन किया , हो उठती घृणा खुद से ही अब तो. ऐसे तूने ऋण दिया, क्यूँ पल पल हृदय विदीर्ण किया, रह गया स्वप्न कहीं अधमरा है क्षीण हुआ अस्तित्व मेरा........ स्वीकार्य मुझे अपवाद सभी, मान्य मुझे संवाद सभी, सज हूं मैं तेरे क्रोध पर भी, अश्नु से भर देते मुझको, वो बात सभी, वो याद सभी, शेष रह जाता भाव बस तेरा, है क्षीण हुआ अस्तित्व मेरा....
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Reg ID: BF25-5790
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