Submission 3375

नर्गिस

Submitted By: Trupti Mehta Drshpande

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वसंतागमन झाले सांगे, ही हळदुली जळीस्थळी पिवळेपिवळे चषक उभे हे, सोबत षटपाकळी संदेश घेउनी सरली थंडी, चहुदिशा आनंदी सरले बंधन, सूर्या वंदन, नाविन्याची नांदी दिवस उजेडी येती कानी, स्वरमैफली पशुपक्षी वसंतराजा आला दारी, काढू रांगोळी रेखीवनक्षी म्हणा कुणी तिज डॅफ्डल्स, म्हणा कुणी नर्गिसं बस नामनिराळे ... बस नामनिराळे ! निरोप एकचं ! निवाला हट्टी हिवाळा, आले उल्हासाचे दिसं धाडीती निसर्ग निरोप, मन माझे मोर, मोरपीस!

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Reg ID: BF25-5696

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