Submission 3170

चले गए

Submitted By: Om Prakash Fulara

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पावस के ये बादल भी अब, जल बरसाकर चले गए। मानव को उसकी करनी का, हाल दिखाकर चले गए। सघन वनों की छाँव घनेरी, लगे सभी हथियाने अब। महल बनाने स्वयं वनों में, आग लगाकर चले गए।। संत समागम में अब देखो, नाच रहीं हैं बालाएँ। शूर्पणखा की सत्ता देखी, देव लजाकर चले गए।। अहम दिखाकर जग को लूटा, खूब कमाया जीवन भर। धन वैभव सब छोड़ यहीं फिर, प्राण गँवाकर चले गए।। जहाँ खेलती थी नदियाँ कल, वहीं मनुज डाले डेरा। महल न भाए मेघों के उर, तभी ढहाकर चले गए।।

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Reg ID: BF25-5593

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