राख की दास्तान
Submitted By: Ahmad Hassan
----------------------------------
चार बरस से लफ़्ज़ जला के राख लिखता हूँ, सत्रह की उम्र में दिल का मलबा राख लिखता हूँ। ख़्वाब मेरे भी सांस रोक के जल गए कब के, चुप की दीवार पे ज़ख्मों का नक्श-ए-राख लिखता हूँ। नाम मत पूछ... बस इतना जान कि दिल का कातिल हूँ, जो दर्द को भी मुस्कुरा के राख लिखता हूँ।
----------------------------------
Reg ID: BF25-5087
Please Note - You can vote only Once. If you have already voted - the voting will be disabled automatically by the system.