Submission 2452

मुखौटे

Submitted By: Muskan Mirjannavar

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रहते कुछ मुखौटे पहने चहरे मेरे आस-पास व पड़ोस। जो इतराते पहने कपड़े सफ़ेद- सफ़ेद खंजर है छुपा जिनके सीनों में लेप शहद का है लिपा जिनके जुबानों पर। इनको न आई लाज,न शर्मिन्दा हुए कभी आत्मा भी लिपटा पड़ा गंदे कारनामों में। कोई नहीं किसीका यहां । बाज़ार लगी हुई है, स्वार्थ की बीमारी की मतलब के नातों की। सुधरने से भी न सुधरे,धोने से भी न धुले काला दाग कारनामों का। बिन पछताए न कोई माफ़ी,गाड़ देंगे जब देना हिसाब मिट्टी के सौ परतोंमें । तब इनकार करेंगे पहचानने से देवदूत भी।

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Reg ID: BF25-5270

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