मजहब
Submitted By: Nasreen Ashafakulla Mujawar
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कफन में दफन है वो ,जो कभी हुस्न-ओ-जमाल में उलझे थे, उलझे थे जो वाहीद,खयाल- ओ- ख्वाब में उलझे थे । अलग होकर आज जब ,रूह बदन का दीदार करती है, मुंह फेर फिर मुस्कुराते ,नए सफर का आगाज करती है । अपनों के अश्कोंको भूल के ,नूर- ए- जहां से जब वो निकलती है खुश्क जख्मों के साथ ,रोशन फिज़ा के और वो बढ़ती है । जहूर- ए- खुदा के मुलाकात से ,चकाचौंध खड़ी रहती है जब पूंछ गया उसे अपने मजहब को पहचान बताती है .. बताते हुए वो ,, इंसान !! बोलना भूल जाती है उलझन देख उसकी,खालिक खुद उसकी पहचान बताता है , मजहबी बुनियाद मेरी नही इंसानोंने इंसानोकों बाटा है ,, मैंने चंद लोग बनाए , और दुनिया में उनका इजाफा है , इंसानियांत उनकी पहचान और अच्छाई जिनका वजीफा है , मुझे जानने की कोशिश मैं ,हर एक का अलग फसाना है और वही से धर्म की शुरुआत और शुरू मजहब का बखाना है
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Reg ID: BF25-5870
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