Submission 3823

प्राण कुन्चिका

Submitted By: Akshaykumar

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मैं बाग़ीचे का माली और तुम सुंदर फूलों का बाग़ जैसी, इस सौंदर्य को दूर से निहारती ये दुनिया, जिस पर सिर्फ मेरा अधिकार हो। मैं पूनम की रात और तुम उसमें चाँद जैसी, इस अँधेरी ज़िंदगी में आयी तुम प्यार की रोशनी हो। मैं पहाड़ों का मुसाफ़िर और तुम ढलते हुए सूरज जैसी, जिस नज़ारे को देख ये दिल माँगे — ढलने में थोड़ा समय और हो। मैं गर्मियों में तपती धरा और तुम बरसात के बादलों जैसी, तन्हाई की धूप सेकता ये प्यासा दिल, तुम उस पर बरसती मीठी बूंद हो। मैं दुर्भाग्य से घिरा विफल पुरुष, तुम सौभाग्य का भंडार जैसी, अब क्या ही डर किसी विपदा से — जब भाग्यलक्ष्मी स्वयं साथ हो।

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Reg ID: BF25-5866

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