खुशियों कि मुट्ठी
Submitted By: Gayatri Aashish Gadgil
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धूप कभी , कभी छाँव जिंदगी दिन गुजारे, हम समय के ग़ुलाम मुट्ठी भर जो हाथ रह जाये कुछ मिठे पल , कुछ खुशियोके पैग़ाम । खूब बढ़िया से जियें है हम बालौंकी सफेदी में खूब खोये है हम तजुर्बे को मुहब्बत से गले लगाये जिंदगी जवांन रख पाये है हम । समय समय कि बात सही हम है गुलाम तो उसिके भाई हाथों मे अब पड़ रहीं झुरियाँ मुट्ठी अब हे छूट रहीं । फ़िसल रहें अब मुठ्ठी से वह पल, कोई हाथ थामले बस यूँहिं कोई हाथ थामले बस यूंह ।
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Reg ID: BF25-5821
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