विरह-विलाप
Submitted By: MD TANVIR HASAN
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तुम्हारा बिछड़ना मेरा संसार से बिरक्तता मेरी आत्मा का तुममे छूट जाना तीनों मेरे अंदर की सबसे नाज़ुक घटना होगी..! इतनी नाज़ुक जैसे पुष्प के पंखुड़ियों से उतरती ख़ुशबू। किसी हरे-भरे वृक्ष का सूख जाना पानी का भाप हो जाना जैसे कि अब हम, हम होंगे ही नहीं। यह प्रेम का बुद्ध मार्ग हैं, मै इसी मार्ग पर अग्रसर हूँ! परन्तु मैं इस मार्ग चलना नहीं चाहता! बिन तुम्हारे प्रेम, मैं बुद्ध भी नहीं बन सकता..!
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Reg ID: BF25-5735
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