Submission 3367

तो तुम्भी कवि हो

Submitted By: Kumar Shubhanshu

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अगर तुम भी दिन भर , कही खयालों में मिलते हो, अगर जहां भर की बातों से , खामोशी को चुनते हो, तुम खरीदते नहीं हो कुछ ,फिरभी बाजारों में मिलते हो, अपनी हालतों को भी ,अजनबियों के हालों में ढूंढते हो, अगर बे मतलब आंखे की धारा, गालों को चूम निकलते हो, अगर खामोश लबों के साँसों में, इंतेज़ार में वक्त गुजरते हो, तो जान लो तुम भी कवि हो, और हज़ारों ने एक मिलते हो। जब तुम अपने शब्दों में , किस की रूह पिरोते हो, उनके प्रेम के हर लफ्जों में ,महसूस डूब उतरते हो, उसकी याद को कागज़ पर,उकेर कर अमर करदे हो, तो जान लो ,तुम भी कवि हो ,जो इश्क को सदियों लिखते हो। चांदनी रातों में वीरानी सरके , इनपर टहल- ठहरते हो, हर चेहरे में छुपी कहानी , तुम अगर खोज निकलते हो, लोगों की आंखों में बेबस,ख्वाहिशों को समझते हो तो तुम दिल से लिखते हो,हजारों में एक मिलते हो।

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Reg ID: BF25-5692

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