खिलने दो नन्हे फूल
Submitted By: Vinayak Usha Bhagwan Budhwant
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यह दुआ है भगवान से, सोते हुए न रहें हम। क्या जात-धर्म लेकर बैठे ही रहें हम? क्या छोटे-छोटे फूलों को खेलने से पहले ही कुचल दें हम? क्या मेरे हक के लिए कानूनी कठपुतली ही बनते रहें हम? मेरा यह कहना है समाज से—क्या सच में कठपुतली हैं हम? यह दुआ है भगवान से कि सोते हुए न रहें हम। क्या मैंने जो सपने सजाए थे, वे तोड़ते ही रहें हम, छोड़ते ही रहें हम? क्या असुरी वृत्ति लोगों का खिलौना बनते ही रहें हम? सच कहो, क्या समाज में रहने के योग्य हैं हम?
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Reg ID: BF25-5595
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