Submission 3174

खिलने दो नन्हे फूल

Submitted By: Vinayak Usha Bhagwan Budhwant

----------------------------------

यह दुआ है भगवान से, सोते हुए न रहें हम। क्या जात-धर्म लेकर बैठे ही रहें हम? क्या छोटे-छोटे फूलों को खेलने से पहले ही कुचल दें हम? क्या मेरे हक के लिए कानूनी कठपुतली ही बनते रहें हम? मेरा यह कहना है समाज से—क्या सच में कठपुतली हैं हम? यह दुआ है भगवान से कि सोते हुए न रहें हम। क्या मैंने जो सपने सजाए थे, वे तोड़ते ही रहें हम, छोड़ते ही रहें हम? क्या असुरी वृत्ति लोगों का खिलौना बनते ही रहें हम? सच कहो, क्या समाज में रहने के योग्य हैं हम?

----------------------------------

Reg ID: BF25-5595

Please Note - You can vote only Once. If you have already voted - the voting will be disabled automatically by the system.

150
Votes
830
Views
11 Months
Since posted

VOTING Closed on Nov 30, 2025!

Scroll to Top