खुद को ढूंढता हूं
Submitted By: Deepak Malapur
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खुद को ढूंढता हूं आज भी खुद में कभी तो तुम में कभी एक घर बनाया साथ जीने के लिए एक सपना सजाया सच करने के लिए तब समय मानो बेरोजगार था न कहीं जाता न कम लगता अब घर है पर महसूस नहीं होता एक दूसरे के लिए समय भी नहीं होता कभी मिलूं तो बताना वो पुराना मैं कभी मिलो तो जताना वही प्रेम चलो मिल जाते हैं बडी देर हुई एक दूसरे से कहनीं हैं बातें कईं खुद को ढूंढता हूं आज भी खुद में कभी तो तुम में कभी
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Reg ID: BF25-5449
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