रेल-रात्रि
Submitted By: DAMODAR KULKARNI
----------------------------------
बड़ी चाह से टक-टक, सज्जे के नीचे से झाँक-झाँक , हवाओं की हलचल को लम्हों के साथ जोड़ दिया। क्यों? क्यों कि चाँदनी की तीज में, दरख्त के नीचे सायों में, कहीं टिमटिमाती आँखों से, उन अनकही सी बातों को। ऐसे ही हमने सहेज लिया, ऐसे ही घाट में सजा दिया, 'अलबेली चलती रात में, अनजान सड़क के साथ में। पल-ही-पल बस याद किया, तुम्हें हर पल बस याद किया।
----------------------------------
Reg ID: BF25-5353
Please Note - You can vote only Once. If you have already voted - the voting will be disabled automatically by the system.