Submission 1852

तलाश..

Submitted By: Shubhankar Patil

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मेरे क़दम जताते हैं कि यह रास्ता कभी ख़त्म ही नहीं होता. हर बार ली हुई कोई राहत की साँस पे कोई दिक़्क़त राह देख रही होती है.. जैसे मेरी हर कोशिश नाकाम हो. और जब लगे कि कुछ हो रहा है, तब समझ आता है कि, "अरे..! मेरी तो दिशा ही ग़लत है..! " थका-हारा हर शाम बसेरे में आना, और वही सवाल जैसे मुझे घूर रहा हो - कभी किसी और का मुझसे, कभी ख़ुद ही ख़ुद से कि, "और भाई, कहाँ तक पहुँचे?" और कोई जवाब नहीं, बस सन्नाटा. जैसे ख़ुद के ही फ़ैसले पर ताज्जुब हो.. हिम्मत और बेवक़ूफ़ी की सीमाएँ जैसे धुंधली नज़र आ रही हों. जैसे घर का पूरा काम ख़त्म करो..जैसे कोई 'to-do list' पे सारे tick-mark लग जाएँ.. जैसे वह काम जो आपको लगा था आप भूलोगे, वह भी हो जाए.. बे-उम्मीद याद आ जाए एकदम से..! जैसे राहत की साँस आए, हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ, बहुत वक़्त बाद... और फिर दिखे, sink के दो बर्तन जो फिर भी छूट गए. पर जंग जारी है... जब तक कोई अंदाज़ा आए और दिशा भी. जंग जारी है.

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Reg ID: BF25-5108

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