बहुत है
Submitted By: RITESH KAMBLE
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फ़नकार बहुत हैं, शायर भी बहुत हैं, लिखना छोड़ दूं क्या? शायद इतना बहुत है। मैं किसी के भी प्यार के क़ाबिल नहीं हूं, मुझे जो लोग चाहते हैं, शुक्रिया, इतना बहुत है। अब तक नहीं लिखे, ऐसे अशआर-ए-माज़रत मैंने, कि वो कहे जाओ तुम्हें माफ़ किया, इतना बहुत है। मैंने खोया, तन्हा और जलता हुआ छोड़ दिया था उन्हें, सज़ा के तौर पर, दीवार पे सिर्फ़ छिपकली है, क्या बहुत है? मेरे ज़ख़्म बहुत शौक़िया नहीं हैं, अशआर लिख लिए, अब पढ़ दो, बहुत है। मैं एक सफ़र में था, नाक़ामीयाबी की वादियों में, तुम्हारा ख़्वाब फिर रुलाने आया, बस करो बहुत है। अब तेरी माज़रत का वो क्या करेगी रितेश, अब तू उसकी ज़िंदगी में नहीं है, बहुत है।
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Reg ID: BF25-5082
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