गिलहरी
Submitted By: saksham sarode
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राम नहीं ना सही, मैं लक्ष्मण बन जाऊंगा, हनुमान ना बन सका तो अंगद बन जाऊँगा सैनिक भी ना बन पाया अगर तो प्रहरी बन जाऊँगा, और अगर वानर ना बन सका तो गिलहरी बन जाऊँगा क्यों के सवाल ये नहीं है के मेरे होने से कुछ फर्क पड़ा या नहीं सवाल ये है के जब वक्त पड़ा था तब मैं साथ खड़ा था या नहीं जो गिलहरी भी ना बन पाया तो उसके नाखूनों में फंसी गीली रेत बन जाऊँगा जब कभी उछालेगी कंकड़ समंदर में पंजे से छूटकर उसके सेतु से लिपट जाऊँगा क्यों के सवाल ये नहीं है के मैं कुछ बदल पाया या नहीं सवाल ये है के जो मैं कर सकता था वो मैंने किया या नहीं चाहे किसी भी रंग, रूप या आकार में किसी ना किसी काम जरूर आऊंगा लेकिन रण होगा जब नीति और अनीति का मैं तटस्थ या अलिप्त ना रह पाऊंगा क्यों के सवाल ये नहीं है के अंत में मेरी जीत हुयी या नहीं सवाल ये है के जब ठन गई थी तब मैं लड़ा था या नहीं सवाल ये सारे सही है और नहीं भी, दरसल सवाल है सिर्फ एक यही के ये सारे सवाल हमें तंग करते है या नहीं
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Reg ID: BF25-5273
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