एहसास
Submitted By: Mahek. A. Makandar
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एक एहसास दबा हुआ है सीने में मेरे जो मेरी कलम से निकलता है । स्याही को लहू समझती हूँ में जो मेरे पन्नो पे बहता है । में बयान करना चाहती थी सब कुछ पर कहानी यहाँ कौन सुनता है । में तो वह चिराग़ हूँ अपने घर का जो अपनों के लिए ही जलता है । लोग करते है इश्क़ में बातें बस वरना कौन किसके लिए मरता है । जब दौर आए मुसीबत का तो हर कोई हमसे मुंह फेरता है । इन साँसों की अज़ियत उससे पूछो जो पल पल बिन-जनाजे गुज़रता है । हाँ मैंने देखी है हक़ीक़त इस ज़माने की कौन कैसा है किसको क्या फ़र्क़ पड़ता है । मेरी रूह तो बनना चाहती है रूमी की तरह जो बस इश्क़-ए-हक़ीक़ी में झूमता है ।।
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Reg ID: BF25-5223
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